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ओ लौट कर ना आने वाले

तेरे वो आगे बढ़ते हुए क़दम और पीछे छूटती तेरी हसरतें मैंने सोचा भी की तुझे आवाज़ दूँ लेकिन शायद तुझे पुकारने की हिम्मत नहीं हुई तूने मुड़ कर ना पीछे देखा ना मेरी आँखों की नमी को महसूस किया ना मेरे जज्बों के बेकल समंदर की मौजों को तूने थम कर देखने की ज़रूरत ही समझी तू चला गया अपने साथ अपने अज़म को लिए में देहलीज़ पर तेरे नक्शे क़दम देखती रही   ओ लौट कर ना आने वाले