बारिश सुनो तो

बारिश सुनो तो 
बढ़ी इतरा रही हो .. झमाझम बरस रही हो .... बादलों में छुपी आसमान की ओट से ज़रा अपना ये सुरमई घूँघट हटाओ और देखो तो कहाँ कहाँ तुम्हारी मोहब्बत के घुंघरू बज रहे हैं ... मेरी छत पर , खिड़की के कांच पर दादा के लोहे के पलंग पर ... नानी के अचार के मर्तबान पर,अम्मी की सूखती लाल मिर्चों पर ...तो भाभी की लहेरिया साड़ी पर भी भाई की गाड़ी पर भी, सुबह से रास्तों पर,चौराहों पर,मस्जिद के गुम्बद पर ,और मंदिर की देहलीज़ पर, हलवाई की कढ़ाही के चारों तरफ,मालनों की सब्जियों के ढेर पर, केसे बरस रही हो ...बारिश तुम तो बिजली के तारों पर दुबके कबूतरों के परों पर तो नीम, अमिया, बुग्न्बेला, मोगरा और गुलाब पर भी, और जाने कितने सारे लाखों पौधे .... नदी पर भी बाँध पर भी, पुल पर, रेल पर ,नल पर कुए पर भी ,खेत पर तालाब पर सूखे सूखे दरकते मैदानों पर ,ऊँचे खामोश खुरदुरे पहाड़ों पर, हाय बड़ी इठला कर बरस रही हो ... वो देखो रिक्शे पर बेठे स्कूल के बच्चों पर और उनके बेग पर भी ,कॉलेज की लड़कियों पर और बेफिक्र लड़कों पर भी , महल से ले कर झोंपड़ी तक शहर से ले कर गाँव तक और उसके पास वाली ढाणी तक सबको भिगो रही हो ..... अब में क्या क्या याद करूँ तुम तो आसमान से मोहब्बत की परी बनी ज़मीन के शह्ज़ादे को अपने इश्क की दलील दे रही हो.... बारिश तुम सच्ची बोहोत प्यारी हो .... और पता है मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो ... सुनो ना यहीं बस जाओ ना में साल भर तुम्हे याद करती हूँ ... और तुम दूर देस की सखी सी बन कर आती हो चली जाती हो ... और फिर पिया देस तुम चली जाती हो .... में बिरहन........ जाओ तुम से इस बार कट्टी है 

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